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Wednesday, August 21, 2019

कश्मीर मुद्दे पर ब्रिटेन के मेडिकल जर्नल ने मोदी को घेरा तो भारत के IMA ने वाजिब जवाब दिया

कश्मीर मुद्दे पर ब्रिटेन के मेडिकल जर्नल ने मोदी को घेरा तो भारत के IMA ने वाजिब जवाब दिया

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# जर्नल-

अख़बार या मैगज़ीन तो देखी ही होंगी. बस. ‘जर्नल’ भी अख़बार या मैगज़ीन की तरह ही होता है. कमोबेश एक निश्चित अंतराल पर छपता है. जैसे मासिक, साप्ताहिक, पाक्षिक. और जर्नल में भी कमोबेश खबरें ही होती हैं. ज्यादातर सामयिक ही. लेकिन मैगज़ीन और जर्नल में सबसे बड़ा अंतर ये होता है जर्नल किसी स्पेसिफिक विषय से जुड़ा होता है. जैसे ‘दी लेंसेट’ एक ‘मेडिकल जर्नल’ है. यानी इसमें मेडिकल के जुड़ी जानकारियां, खबरें और अपडेट्स होंगी.
अख़बार या मैगज़ीन के इतर जर्नल में खबर, खबर की तरह नहीं एक्सप्लेनर की तरह होती हैं. इन डेप्थ. साथ ही ये इन डेप्थ एक्सप्लेनर, लल्लनटॉप सरीखे आसान भाषा में नहीं होते. क्यूंकि जर्नल, अख़बारों और पत्रिकाओं से इतर, उन पाठकों को कैटर करते हैं, जिनके पास उस विषय से जुड़ी काफी इनफार्मेशन पहले से होती है, जिस विषय पर जर्नल छपता है. वो क्या कहते हैं अंग्रेज़ी में प्री रिक्युज़िट इन्फोर्मेशन. तो अगर मैं मेडिकल स्टूडेंट नहीं हूं तो मेरे लिए ‘दी लेंसेंट’ के ज़्यादातर काले अक्षर भैंस बराबर ही होंगे.

# दी लेंसेट-

तो, जैसा हमने पहले ही बताया, ‘दी लेंसेट’ एक ‘मेडिकल जर्नल’ है. ब्रिटेन से छपता है. दी लेंसेट एक ‘जर्नल मेडिकल जर्नल’ है. कन्फ्यूज़ हो गए न? अंग्रेज़ी में पढ़िए- General Medical Journal. General मतलब, ऐसा Medical Journal जो चिकित्सा से जुड़ी कोई भी चीज़ प्रकाशित कर सकता है. हार्ट से जुड़ी भी और कैंसर से जुड़ी भी. दवाइयों से जुड़ी भी और बीमारियों से जुड़ी भी. अगर केवल कैंसर की बात करता होता तो ‘स्पेसिफिक मेडिकल जर्नल’ हो जाता.
हां तो ‘दी लेंसेट’ एक ‘जर्नल मेडिकल जर्नल’ है. बहुत पुराना. कितना पुराना लगभग 200 साल पुराना. 1823 में स्थापित हो गया था.

# आज क्यूं बात हो रही है?

आज इसलिए बात कर रहे हैं क्यूंकि ये जर्नल भारत में अख़बारों की सुर्खियां बन रहा है या कल परसों तक शायद और बन जाएगा. और इस स्टोरी को शुरू से शुरू करते हैं.
तो ये जो जर्नल हैं उसमें भी अख़बारों की तरह ही खबरों के इतर एक और चीज़ छपती है. सम्पादकीय. विवाद ‘दी लेंसेट’ के इसी सम्पादकीय को लेकर शुरू हुआ और अब आईएमए तक पहुंच चुका है. आईएमए पर बाद में आएंगे पहले सम्पादकीय में क्या लिखा था वो जान लें. बाकी बातों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण और विवादित बात ये कि ‘दी लेंसेट’ ने अपने एडिटोरियल में यूनाईटेड नेशंस की 8 जुलाई, 2019 को प्रकाशित एक रिपोर्ट का रेफरेंस देते हुए कहा है कि राज्य में सुरक्षा बलों और सशस्त्र समूहों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है. इसके पक्ष में काफी स्टेटिस्टिक्स और उदाहरण भी दिए हैं.
चूंकि ‘दी लेंसेट’ एक मेडिकल जर्नल है इसलिए स्वास्थ से जुड़े फैक्ट्स और उदाहरण देकर इस एडिटोरियल का इस जर्नल में होना अप्रत्यक्ष रूप से जस्टिफाई किया गया है. जैसे एक मेडिकल स्टडी का हवाला देते हुए, जिसका लिंक फिलवक्त नहीं खुल रहा, दी लेंसेट कहता है कि-
पांच में एक आदमी ने मौत को देखा है. इसलिए कोई आश्चर्य नहीं की वहां लोगों में डिप्रेशन, एनज़ाइटी और ट्रॉमा के बाद होने वाले विकार पाए जाते हैं. 
अंत में अपनी बात समाप्त करते हुए दी लेंसेट का संपादकीय लिखता है-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कसम खाई है कि स्वायत्तता को रद्द करने का उनका फैसला कश्मीर में समृद्धि लाएगा. लेकिन सबसे पहले, कश्मीर के लोगों को इस दशकों पुराने संघर्ष के गहरे घावों से बचाव की जरूरत है, न कि दमन की जो आगे की हिंसा और अलगाव को और बढ़ावा देगा.

# आईएमए का जवाब-

लेकिन भारत ने दी लेंसेट को वाजिब जवाब दिया है. भारत की उस संस्था ने, जिसका जवाब सबसे ज़्यादा मायने रखता. देखिए ‘दी लेंसेट’ एक मेडिकल जर्नल है, तो सबसे औचित्यपूर्ण जवाब भारत की किसी मेडिकल संस्था का ही लगता. इसलिए भारत की मेडिकल संस्था, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने सीधे संपादक का नाम लेते हुए ब्रिटेन के इस जर्नल को घेर लिया.
आईएमए द्वारा दी लिसेंट के एडिटर-इन-चीफ रिचर्ड हॉर्टन को चिट्ठी लिखी गयी है. कहा गया है, कि अंकल ये हमारा, यानी भारत का निजी मामला है और आप बेगानी शादी में दीवाने न ही बनें तो अच्छा. (वैसे शब्दशः ऐसा नहीं कहा है, लेकिन बस आप समझ लो).
साथ ही आईएमए ने ये भी कहा कि कश्मीर का रायता अंग्रेज़ों (दी लेंसेट की मातृभूमि, इंग्लैंड के निवासी) द्वारा ही फैलाया गया है, तो आप तो न हो बोलो.
और अपनी भाषा में अंततः ये भी कहा कि हमारी नज़र में जो दी लेंसेट की इज़्ज़त थी हम उसे ऑफिशयली ‘गिरा’ रहे हैं (withdraws the esteem we had for the Lancet.)
कुछ लोगों का तर्क ये भी है कि एक मेडिकल जर्नल ने एक पॉलिटिकल इश्यू पे कैसे बोल दिया. होने को इस तर्क के पक्ष और विपक्ष दोनों हैं. फिर भी…
तो, खबर तो यहीं तक है. ओपिनियन हमारी तरफ से कुछ नहीं है. उनकी यानी ब्रिटेन के इस जर्नल की तरफ से जवाब का इंतज़ार है. वैसे तो उन्होंने कोहिनूर नहीं दिया, जवाब क्या ही देंगे.

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