ABVP ने NSUI को धप्पा न दिया होता तो शायद कांग्रेस के होते अरुण जेटली
179
शेयर्स
शेयर्स

अरुण जेटली 2014 का आम चुनाव हारने के बावजूद सरकार में शामिल किए गए थे. (फोटो साभार: गेट्टी इमेजेस)
लंबी बीमारी के बाद अरुण जेटली चल बसे. काफ़ी दिनों से बीमार थे. बीमारी के ही कारण इस सरकार का हिस्सा नहीं बने थे. मगर उससे पहले एक भरा-पूरा करियर. बड़े वकील. ख़ूब हासिल किया. वित्त मंत्री. एक समय पर फाइनैंस और डिफेंस, दोनों के मंत्री. बहुत कुछ. मगर इतनी लंबी पॉलिटिक्स में जेटली के हाथ बस दो चुनाव दर्ज हैं. जिसमें से एक जीता. एक में हारे. मगर हार ऐसी कि हारने के बाद इनाम पाया. ये उसी जीत और हार की कहानी है.
Full of life, blessed with wit, a great sense of humour and charisma, Arun Jaitley Ji was admired by people across all sections of society. He was multi-faceted, having impeccable knowledge about India’s Constitution, history, public policy, governance and administration.
6,305 people are talking about this
इकलौती चुनावी जीत
ये 70 के दशक की बात है. जेपी आंदोलन का टाइम था. कॉलेज-यूनिवर्सिटी. वहां की छात्र राजनीति. सब आंदोलन के असर में थी. जेटली थे दिल्ली यूनिवर्सिटी में. साल था 1971 में. जेटली की मुलाकात हुई श्री राम खन्ना से. खन्ना का कनेक्शन था अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (ABVP) के साथ. यही खन्ना राजनीति में जेटली का एंट्री पॉइंट बने. खन्ना श्री राम कॉलेज यूनियन के प्रेज़िडेंट थे. उन दिनों DU छात्रसंघ चुनावों में डायरेक्ट वोटिंग नहीं होती थी. एक सुप्रीम काउंसिल थी. इसमें DU के अलग-अलग कॉलेजों के प्रतिनिधि होते थे. यूनियन के चार पदों- प्रेज़िडेंट, वाइस प्रेज़िडेंट, सेक्रटरी और असिस्टेंट सेक्रटरी, इन सबको सुप्रीम काउंसिल के सदस्य ही चुना करते थे. बहुत कॉम्प्लैक्स सिस्टम था. खन्ना ने इसी सुप्रीम काउंसिल में नॉमेनेट किया जेटली को.
ये 70 के दशक की बात है. जेपी आंदोलन का टाइम था. कॉलेज-यूनिवर्सिटी. वहां की छात्र राजनीति. सब आंदोलन के असर में थी. जेटली थे दिल्ली यूनिवर्सिटी में. साल था 1971 में. जेटली की मुलाकात हुई श्री राम खन्ना से. खन्ना का कनेक्शन था अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (ABVP) के साथ. यही खन्ना राजनीति में जेटली का एंट्री पॉइंट बने. खन्ना श्री राम कॉलेज यूनियन के प्रेज़िडेंट थे. उन दिनों DU छात्रसंघ चुनावों में डायरेक्ट वोटिंग नहीं होती थी. एक सुप्रीम काउंसिल थी. इसमें DU के अलग-अलग कॉलेजों के प्रतिनिधि होते थे. यूनियन के चार पदों- प्रेज़िडेंट, वाइस प्रेज़िडेंट, सेक्रटरी और असिस्टेंट सेक्रटरी, इन सबको सुप्रीम काउंसिल के सदस्य ही चुना करते थे. बहुत कॉम्प्लैक्स सिस्टम था. खन्ना ने इसी सुप्रीम काउंसिल में नॉमेनेट किया जेटली को.

1972 में जब खन्ना DUSU के अध्यक्ष बन गए, तो श्री राम कॉलेज के छात्रसंघ की अध्यक्षता आई जेटली के हिस्से. 1973 में जेटली ने DU के लॉ डिपार्टमेंट में दाखिला लिया. ऐसी उम्मीद थी कि उस साल ABVP छात्रसंघ चुनावों में अध्यक्ष पद के लिए जेटली को उम्मीदवार बनाएगी. वो यूनिवर्सिटी की राजनीति में काफी सक्रिय थे. पहचान बन गई थी. मगर ऐसा हुआ नहीं. उनकी जगह संघ के स्वयंसेवक आलोक कुमार को प्रत्याशी बनाया गया. जेटली से वाइस प्रेज़िडेंट का पर्चा भरवाया गया.
I am sorry to hear about Mr Arun Jaitley's passing. My condolences to his family and friends. May he rest in peace.
3,502 people are talking about this
…तो जेटली कांग्रेस के हो जाते1974 का छात्रसंघ चुनाव खास था. पहली बार डायरेक्ट वोटिंग से चुनाव होना था. इसी साल अध्यक्ष पद की दावेदारी जेटली के हिस्से आई. मगर तब कुछ ऐसा हो रहा था कि वो हो जाता, तो जेटली कांग्रेस के हो जाते. वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा उस समय कांग्रेस के छात्रसंघ NSUI में थे. उन्होंने कैरवान मैगज़ीन के प्रवीण डोंथी को बताया. कि जेटली चुनाव लड़ते, तो उनका जीतना लगभग तय था. सो NSUI जेटली को अपने साथ लाना चाहती थी.

इधर ABVP चाहती थी जेटली उसके साथ आएं. दिल्ली में ABVP के मुखिया थे प्रभु चावला. उन्होंने अपने एक साथी राजकुमार भाटिया के साथ मिलकर लगातार तीन दिनों तक संघ को मनाया. कि वो पिछले साल की तरह न करे. फटाफट जेटली के नाम पर ही मुहर लगाए. जेटली को अपने साथ करने में कांग्रेस कामयाब न हो जाए, इस सावधानी में ABVP ने फटाफट जेटली के नाम का ऐलान कर दिया. NSUI के लिए ये अनाउंसमेंट धप्पा था. कि वो तो अपनी तरफ से जेटली का नाम फाइनल ही कर चुके थे. जेटली बड़े अंतर से जीते वो चुनाव. उस वक़्त उन्हें ये मालूम नहीं रहा होगा कि ये उनके जीवन की इकलौती चुनावी जीत होगी.
Vice-President, M Venkaiah Naidu on #ArunJaitley: His death is an irreparable loss for the country and personally to me also. I have no words to express my grief. He was a powerful intellectual, an able administrator and a man of impeccable integrity.
223 people are talking about this
पहली बार संसदीय चुनाव लड़ा, तो क्या हुआ?
साल था 2014. लोकसभा चुनाव होना था. नरेंद्र मोदी का नाम बमबम हो रहा था. जेटली बीजेपी में रहे तो और बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां निभाईं. मगर ससंदीय चुनाव नहीं लड़े कभी. पंजाब की राजनीति में अकाली थे. यहां सिद्धू और बादल परिवार के बीच लोचा था. बादल चाहते थे, किसी तरह सिद्धू का टिकट कट जाए. मगर ये आसान नहीं था. अमृतसर की सीट 2004 से ही सिद्धू के पास थी. यही अमृतसर, जहां स्वर्ण मंदिर था. वही स्वर्ण मंदिर, जहां इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया था. बहुत सेंटिमेंटल सीट थी ये. ऊपर से ऑपरेशन ब्लू स्टार का 30वां साल. कांग्रेस का ज्यादा चांस नहीं था यहां. कहते हैं कि सुखबीर सिंह बादल खुद ये प्रस्ताव लेकर आए थे जेटली के पास. कहा था कि आप बस नॉमिनेशन भर दो. बाकी हम देख लेंगे. आपको जिताना, हमारी जिम्मेदारी. अमृतसर चूंकि सेफ सीट थी, सो जेटली मान गए.
साल था 2014. लोकसभा चुनाव होना था. नरेंद्र मोदी का नाम बमबम हो रहा था. जेटली बीजेपी में रहे तो और बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां निभाईं. मगर ससंदीय चुनाव नहीं लड़े कभी. पंजाब की राजनीति में अकाली थे. यहां सिद्धू और बादल परिवार के बीच लोचा था. बादल चाहते थे, किसी तरह सिद्धू का टिकट कट जाए. मगर ये आसान नहीं था. अमृतसर की सीट 2004 से ही सिद्धू के पास थी. यही अमृतसर, जहां स्वर्ण मंदिर था. वही स्वर्ण मंदिर, जहां इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया था. बहुत सेंटिमेंटल सीट थी ये. ऊपर से ऑपरेशन ब्लू स्टार का 30वां साल. कांग्रेस का ज्यादा चांस नहीं था यहां. कहते हैं कि सुखबीर सिंह बादल खुद ये प्रस्ताव लेकर आए थे जेटली के पास. कहा था कि आप बस नॉमिनेशन भर दो. बाकी हम देख लेंगे. आपको जिताना, हमारी जिम्मेदारी. अमृतसर चूंकि सेफ सीट थी, सो जेटली मान गए.
#ArunJaitley's last rites tomorrow; BJP leaders pay homage
64 people are talking about this
सिख बनाम हिंदू. बाहरी बनाम भीतरी.जेटली ने समय रहते मोदी की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी का समर्थन कर दिया था. वो प्रो कैंप में थे. उनके लिए मन-मुआफ़िक सीट चुनना बिल्कुल मुश्किल नहीं था. सो सिद्धू का अमृतसर से टिकट कट गया. सिद्धू नाराज़ भी हुए बहुत. ख़ैर, इधर बीजेपी ने जेटली को मैदान में उतार दिया. मगर कांग्रेस का कुछ तय ही नहीं हो रहा था. फिर कांग्रेस को दिखा मौका. सिद्धू की जगह जेटली को टिकट दिए जाने को कांग्रेस ने ‘सिख बनाम हिंदू’ का सवाल बना दिया. कांग्रेस ने चुना कैप्टन अमरिंदर सिंह को. वो थोड़े नाराज़ चल रहे थे. ख़ासतौर पर राहुल गांधी से. कहते हैं, सोनिया ने ख़ुद कैप्टन को फोन मिलाया. उन्हें अमृतसर से चुनाव लड़ने को मनाया. अमरिंदर तैयार हो गए. उन्होंने बाद में मीडिया से कहा भी. कि कैसे उन्होंने सोनिया से कहा था कि वो चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. मगर फिर पार्टी का फ़ैसला मानकर राज़ी हो गए. अब ये बाहरी और भीतरी की भी लड़ाई हो गई.
Watch this video to know more about the life of Arun Jaitley, a suave politician, with a long experience in matters both legal and political. #ArunJaitley #Arun_Jaitley #bjpleader
197 people are talking about this
अमरिंदर ने कहा, जेटली बाहरी हैं. जवाब में जेटली ने पूछा, अमरिंदर बताएं कि सोनिया कहां की हैं. जेटली ख़ुद का पंजाब कनेक्शन बताते घूमते रहे. कहा, चुनाव जीत लिया तो अमृतसर में अपना घर भी रखेंगे. मगर कुछ काम नहीं आया. कैप्टन को मिले 4,82,876 वोट. जेटली 1,02,770 वोटों से हार गए. ये अलग बात है कि हारकर भी जेटली को वित्त मंत्रालय मिला. बल्कि एक समय तो ऐसा भी आया कि फाइनैंस मिनिस्ट्री के साथ-साथ उन्होंने रक्षा मंत्रालय भी संभाला.





No comments:
Post a Comment